soothing लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
soothing लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
रविवार, 27 दिसंबर 2020
प्रिय
जीवन -राह में साये -सी,
हर- दिन की प्रातः लाली -सी ,
चिड़ियों की चहचहाहट में,
सबसे नहीं सिद्धांत यह - मेरा
तुम प्रियतम भाव ही पाओगे।
मंगलवार, 22 दिसंबर 2020
ख्वाहिश ही जीवन
ख्वाहिश ही जीवन
मन की किताब खोलूँ ,
तो ख्वाहिशों के पन्ने।
पन्नो पर अंकित शब्द ,
यूँ झूमते गज़ल हों।
मांझी भी तो तूं है,
पतवार भी तो तूं है।
जीवन तू है धारा,
पानी सा बहता पल है।
जीवन हमें बढ़ाती,
, यूँ तेज़ धार करके।
बढ़ता रहे तूं यूँ ही ,
ले ख्वाहिशों की डोरी ,
जीवन को इनसे- कस कर,
ले बढ़ ले- तूं बढ़ कर।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. The art belongs to Sara Riches
शनिवार, 17 अक्टूबर 2020
जो तुम आ -जाते एक बार (part-2)
जो तुम आ -जाते एक बार (part-2)
जो तुम आ -जाते एक बार
धुल जाते सारे राग-ताप।
जो तुम आ -जाते एक बार।
ऐसी चुप्पी क्यों साथ -साथ ,
जिसमें सन्नाटों की बास।
जो देते जख्मों पर आघात ,
जो तुम आ -जाते एक बार।
सुन लेती तुम जो मेरी बात ,
सन्नाटों में होते धुन हजार।
नजरें कर देती शिक़वे बयान।
रिमझिम झींसे- स्नेहिल तार,
भेदे मिटते सारे संताप।
छंट जाते बादल पृथक तार।
हो जाते मन भी खुशगवार।
जो तुम आ -जाते एक बार।
बोझिल मन भी हो शांत -शांत ,
बाहर मौसम भी खुश मिज़ाज।
सोने का सूरज साथ -साथ,
रोशन करता ये गुलिस्तां।
जो तुम आ -जाते एक बार।
संपने बुनती मैं बार -बार ,
कर आँखों से बातें हजार।
जो तुम आ जाते एक बार।
धड़कन भी करती सौ बात ,
हर आहट नजरें झाँक-झाँक।
जो तुम आ -जाते एक बार।
मधुरम बेला करते तलाश ,
संग ख्वाबों में भी बांध शमाँ ।
जो तुम आ -जाते एक बार।
खुद से करती बातें हज़ार।
पल -पल करती मैं इंतजार ,
जो तुम आ -जाते एक बार।
संवेगों की ये तीक्ष्ण चाप ,
कर देती मुझको हैरान।
जो तुम आ -जाते एक बार।
यांदो की विस्मृत ये उड़ान ,
गूँथी मंजरियों संग याद,
जो तुम आ -जाते एक बार।
भावों के मंजर साथ -साथ,
पलते रिश्ते की हर शाख।
जो तुम आ -जाते एक बार।
बदले -बदले से हर तार ,
मुद्रा भी करती नृत्य -नाद।
जो तुम आ -जाते एक बार।
भावों के भाव -थपेड़ों में ,
पल -पल गुजरे जो साथ -साथ।
जो तुम आ -जाते एक बार।
जीवन शिक़वे के भी हज़ार ,
कर लेते मिल दो -चार -हाथ।
जो तुम आ -जाते एक बार।
जीवन के इतने रंग -तले ,
हम भी बन जाते चित्रकार।
जो तुम आ -जाते एक बार।
हर रंगों की अपनी है छाप,
ले -लेते ठप्पे साथ -साथ।
जो तुम आ -जाते एक बार।
मधुरम काया ले साथ -साथ,
घुल -मिलकर रहते साथ -साथ।
जो तुम आ -जाते एक बार।
जीवन के इन चलचित्र तले,
दुःख में भी रहते साथ -साथ।
जो तुम आ -जाते एक बार।
सूई-धागे बन साथ -साथ,
गूँथते रिश्ते के हर तार,
जो तुम आ जाते एक बार।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. Image from efficacy.org
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2020
निद्रा
निद्रा
बंद आँखों में संजती सदा,
खुली आँखों में वास तेरा।
पलकें खोलूं तो सबेरा ,
बंद आँखे गहन अँधेरा।
ये अँधेरी रात तलाशती तुझको ,
तेरे आने की दस्तक बताती मुझको।
घुमड़ -सिहरन की चोट सी ,
उमड़ती आँखों में विश्राम तू।
तेरे आने से श्रांत होती धड़कन ,
नस -नस बिखेरती सिहरन।
तेरे छूने से मन विश्राम करता मेरा ,
दिलो -धड़कन भी आराम करता मेरा।
तेरे होने से चार्ज होता हर पल ,
तेरा आना विश्राम देता तत्क्षण।
हलचल तेरा तरोताजा करता मुझको ,
नई सुबह ला जगाता मुझको।
स्फूर्ति सुनहरी रश्मियों को बिखेरकर,
नव जोश भर राह पर चलाता मुझको।
पथ चुन आगे बढ़ाता मुझको,
कशिश को कोशिश भी बनाती तू ही।
मुस्कान भर मंजिल तक पहुँचाती तू है।
तेरा होना यूँ जरूरी सा लगता मुझको ,
जिंदगी में श्वासों का होना जैसे।।
- अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustration. The image was added from society6
शनिवार, 10 अक्टूबर 2020
मित्रता
मित्रता
मित्रता एक भाव है,
संबंधो का शिलान्यास है।
उम्मीदों की आस है,
भीनी -एहसास है।
रिमझिम -बरसात है ,
तपन की प्यास है।
उम्मीदों की आस है,
बेफिक्र भी ख्वाब है।
रिश्ते की जान है ,
उमंगो की उड़ान है।
अनजाना पहचान है,
रिश्ते की शाख है।
पत्तों की झिलमिल छांव है।
गुत्थी सुलझाने की ,
मुश्किलें भगाने की,
जख्मो को भरने की,
सोच को बदलने की,
पथ को परखने की ,
संकल्प को लेने की ,
लक्ष्य को छूने की।
सपने जगाने की ,
राह की तपिश में ,
चंदन विखेरने की।
सपने बुनने की ,
मंजिल को लेने की।
बस !
जरूरत है तुमको,
मित्र को परखने की।।
अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations
शनिवार, 12 सितंबर 2020
बचपन
बचपन
वे फुरसत के दिन व बचपन की यादें,
बहुत याद आती है काग़ज की नावेँ।
वे रिमझिम सी बुँदे हथेली में लेना,
वो वायु के झोंको को महसूस करना।
यूँ बारिश की बूँदो से खुद को भिगोना,
वो मिट्टी के खुशबू में खुद खो जाना।
वो चिड़िया की चूँ-चूँ में खुद डूब जाना ,
यूँ तितली की रंगत से विस्मित हो जाना।
न कल की फ़िक्र न चुभन कशिश की,
बस बढ़ते कदम थे न राहें सीमित थीं।
न टीवी की हलचल न गाड़ी की भगदड़,
जहाँ भी देखो वहीं मनोरंजन।
वह दादी की बक -बक व तानों के सुर में,
बसते थे सारे शालाओं के सिलेबस।
यूँ जीवन के सिलेबस सिखाती थी दादी ,
नियमों का पालन करती थी दादी।
न कोई किताबें न कोई पढ़ाई,
यूँ जीवन के सिलबस कराती थी दादी।
जीवन के हर पल थे शिक्षण के साधन,
निर्णय परीक्षा व अनुभव ही दीक्षा।
अनुभूति का अनुभव ही जीवन के ग्रेड,
संस्कारों के बंधन से संजते संदेश।
अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations.
पड़ाव उम्र का
पड़ाव उम्र का
देखो तुम आज बहुत सुंदर हो,
तुम्हारा रूप सलोना मुझे भाता है।
उभरती माथे की लकीरें,
बतातीं तेरा चिंतन।
तेरे परिपक्व लब्ज़ जो चटक पड़ गए ,
तेरे शब्दों की गहराई नापती।
तेरे मुस्कान की उभरतीं लकीरें भी ,
बयाँ करती सुख की सच्चाई सारी।
आँखों के नीचे ये जो काले धब्बे हैं ,
बयाँ करती ये नजरों की पहुंच भारी।
यूँ नाक को सिकोड़ झल्लाना तेरा,
यूँ शेर का दहाड़ सब पर भारी।
यूँ श्याह होठ व उभरतीं झुर्रियों की लकीरें,
बयाँ करती संबेदना सारी।
देखो तुम सुंदर बहुत हो ,
दिखने दो ये संगमी केश अपने।
बयाँ करने दो बदलाव अपने।
जो सफ़ेद हैं सहजता बयाँ करते हैं ,
जो काले हैं इन्हे रंगों में भीगने दो।
उम्र तो पड़ाव से गुजरता है ,
गुजरने दो, उभरने दो-मचलने को।
न रोको,न टोको ,बढ़ने दो,
बढ़ने दो इन्हे बढ़ने दो,
स्वयंम से संवरने दो।
मोहित हो महकने दो ,
मोदित हो मचलने दो।
उम्र के लकीरों को ,
खुले दिल से आने दो
संज के संवरने दो
खुद को समझने दो।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations
शनिवार, 5 सितंबर 2020
मां
मां
मन तू मेरा एक दर्पण है,
तू सच्चा है तू प्रियतम है।
बतलाती काया की धड़कन,
हर धड़कन की तू स्पंदन।
हर अंगो को पहचाने तू,
हर आहट मेरी परखे तू।
नित साज़ लिए नव बोल लिए,
नव -गान से करता अभिनंदन।
तेरी ख़ामोशी भी मुझको,
ढूढ़े-सागर की मोती सी।
न जाने क्या -क्या ले चलते,
हर -मोड़ -राह पर पटके तू।
जब देखूं अपने अंगो को,
मां की तस्वीर बयां करे।
अपने भीतर उसकी छवि ही,
हर -धड़कन को महसूस करूं।
जब भी देखूं खुद गौर करूं,
तेरे ही चित्र उड़ेल चलूँ।
मेरे पावों की उँगलियाँ,
मां तेरे ही पद -चिन्ह लगे।
हर -कदम बढ़े पद -चिन्हों से,
हर -चाप में तेरे चिन्ह सँंजे।
माना की अब मैं तरुणी हूँ,
पर तू भी तो है तरुणी मां।
बस फ़र्क जरा सी हममें मां,
बस काया और जजबात तले।
तेरे हिस्से जितने मोती,
हर मोती तूने परखा मां।
जजबातों संग पिरोकर मां,
संबंधो में बांधा मुझको।
जब देखूं दर्पण में खुद को,
तेरी काया साकार मिले।
मुझको लगता मैं तुम ही हूँ,
मेरी राहें मेरे पद में।
जीवन के हर दर्पण में मां,
तेरा ही रूप साकार मिले।
तेरे प्यारे -मोहक छवि में,
हर पल मेरा विश्राम करे।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations.
गुरुवार, 27 अगस्त 2020
"दोस्ती"
"दोस्ती"
दोस्त अच्छे होते है। ,
खामोश जब शब्द हों ,
राह में चुभन हो,
गर्दिश में तारें हों ,
अंधकार में डूबा मन हो,
शाखें वीरान हों ,
पत्तियों में भी ताप हो,
हवाओं में चुभन हो ,
बारिश में जलन हो,
ऐसे में तुम्हारा आना,
यूँ मुश्किलों को संभालना,
रात-दिन में बदल जाता है,
तारे- टिमटिमाते हैं,
जुगनू -झिलमिलाते हैं,
घनी-शाखें बाहें फैलाए,
पत्तियां छतरी ताने,
हर-लेते तपन सारे,
तेरा होना-तेरा आना ,
बारिश की रिमझिम-बूँदे बन,
खिला देते पुष्प यूँ ,
खिल जाता मन घुमड़ कर,
मिट जाती है बदली दुःख की,
नैनों से नीर भी फिसल जातीं अपलक।
मित्र तुम्हारा आना,
यूँ ढाढ़स-भरा मुस्कुराना,
नजरों का यूँ -बोलना,
महक सोंधीं मिटटी की,
बिखेरती ये एहसास है।
तू पाक भी है ,
तुझमे नूर भी है,
सुख -समृद्धि की पहचान भी है।
तू सच्चा है ,
तू मोहक है ,
तेरा रिश्ता भी एक नूर है।
अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. digital art from freelancer.com
शनिवार, 25 जुलाई 2020
जिंदगी गुदगुदाती है
जिंदगी गुदगुदाती है
जिंदगी एक खुशनुमा एहसास है तू,
प्रेम,स्नेह,भरोसा,विश्वास के साथ है तू।
आशा की चादर ओढ़ चैन की नींद देकर,
आगे-बढ़ नीलांबर छूने की ख़्वाब है तू।
ख़्वाबों की तकिया लगाकर सुलाती है तू,
उम्मीदें जगा थपथपाती है तू।
तेरे साथ रहना अच्छा लगता है ,
तेरा-हर शब्द सच्चा लगता है।
राह चलते काँटों का एहसास देती है तू,
चुभन हटाकर आगे भी धकेलती है तू।
सच-झूठ का फर्क बताकर हमें,
सच्चा-राहगीर बन साथ निभाती है तू।
धुप-छांव तेरे- शाखों से,
अठखेलियाँ यूँ करते है ,
जैसे नन्हा-शिशु पानी में,
पकड़ता हो प्रतिबिम्ब अपनी।
पल-पल तेरा विस्मित कर,रिझाता है मुझको,
गुदगुदा-कर यूँ गले भी लगाता है मुझको।
भरोसा-विश्वास की चादर-तले अठखेलियाँ करती,
आशा के पंख फैला हमें मोहित करती।
तेरा विस्मय-रिझाना अच्छा लगता है ,
तेरा साथ प्यारा लगता है।
तेरा हर पल मेरे एहसास को गुदगुदाता है,
पल-पल बढ़ने को उकसाता है।
नील अंबर छूने की चाह लिए,
संकल्प ले कर्म को जगाता है।
तू प्यारा भी है,तू मोहक भी है,
तेरा हर-क्षण मुझे गुदगुदाता है।
तेरा प्यारा-सा स्पर्श मुझे,
आगे बढ़ने को उकसाता है।
ज़िंदगी तू मीठी व मोहक-बन ,
हर क्षण मुझे गुदगुदाती है।।
अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations.
रविवार, 5 जुलाई 2020
संकल्प
संकल्प
वह आदमी आदमी -ही क्या,
जिसके जीने का मकसद न हो।
वह चिराग चिराग-ही क्या,
जिसकी तेज -रोशनी न हो।
वह सफ़र सफ़र -ही क्या,
जिसकी कोई मंजिल न हो।
वह मंजिल मंजिल -ही क्या,
जिसकी राहें कठिन न हों।
हौसले बुलंद हों अगर,
तो रास्ते आसान है।
मंजिल तो मिलेगी ही,
चाहे लाख तूफ़ान हो।
रश्मि तेरे तेज की,
मिटा देगी तूफ़ान को।
बनके हम-सफ़र वह,
पनाह देगी-छाँव की।
- अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the images
मंगलवार, 16 जून 2020
चित्त
चित्त
न सुर है, न ताल।
न लय है, न लावण्यता।
पल -पल बजती है जो,
वह है चित्त की चंचलता।
बाँधू मैं, तो बिखरे ये।
पकड़ूँ मैं तो भागे ये।
जकड़ू मैं, तो फैलता जाये।
रोकूं मैं तो चलता जाये।
छोड़ दूँ तो थिरकता है,
नए ताल बजाता है।
नीरव ताने छेड़े तत्क्षण,
जब खो जाता मन अंतस्तल।
मन हो जाये जब भी खिन्न,
कर देता तत्क्षण ये मलीन।
कोई दे सकता क्या ऐसा,
जिसमे हो,चित्त की स्थिरता।
रहूँ शांत, पर प्रेम उद्वेलित।
छूं कर भी न हो नीरवत।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations.
रविवार, 7 जून 2020
प्रकृति
प्रकृति
संकुचाते सम्भले लोचन से ,पलकें यूँ नीचे गिरतीं हैं।
मानों ओसीली बूँदे यूँ, पत्तों से यूँ फिसलते हों।
आकाश की रिमझिम बूंदें बन, धरती की ताप को हरती है।
यूँ ही तुम आंसू की बूँदे, मन के संताप को हरती हो।
लो फ़िसल गयीं ये बूँदे भी, सनकर सारे संताप हरे।
मन थिरक उठा अब होठों पर,अपनी विस्मृत मुस्कान लिए।
कुदरत तेरी इस सृजन में, न जाने कितने विस्मय हैं।
अचम्भित कर देतीं मुझको,न जाने कितने रंग भरे।
अपनी बातें खुद से कर लूँ,मन में सारे प्रश्नों को ले ।
इन प्रश्नों के उत्तर भी तो ,दे देता तूँ शब्दांश तले।
मन घुमड़-घुमड़ न जाने क्यों,घूमता -फिरता संवाद करे।
संवाद भरे इन बोलों से,यूँ रंग -मंच श्रृंगार करे।
जीवन के अद्भुत रंगों से,विस्मय अनुभूति चित्र सजे।
सोंचू मैं तो पाऊँ तुझको,फिर क्यों मैं कोई रंग भंरु?
तू सृष्टा है ,मैं कृति हूँ तेरी।
अभिलाषित स्वर अब मुखरित हो।
जीवन के चित्र सजे यूँ ही,मन थिरकन का स्पंदन हो।
रंगो की चटख रश्मियों से,जीवन का चित्र मनोरम हो।
ये जीवन तुझको है अर्पण,सौगात जो तूने दी मुझको।
मन प्रमुदित हो अभिलाषित हो,पल -पल तेरे इन रंगों से।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the vector illustration.
शुक्रवार, 5 जून 2020
कोरोना
कोरोना
कोरोना एक परिहास नहीं,
शिवांश है ये।
युग की तब्दिलियों का उद्गार बन,
कर चुकी शंखनाद है ये।
क्षितिज के आक्रोश से,
धरा सिमट चुकी थी तू।
शिवांश धरा पर मुखर ,
कर रहा प्रतिकार ये।
धुंध आसमान का,
चीर कर बढ़ा है तू।
नील अंबर का पट,
लो फिर से संवर गई।
शिवांश धरा पर अब,
कुछ यूँ ये उतर चली।
तपन की प्यास,
जो मशीने मिटाती।
चाँदनी सी श्याह बन,
समां चुकी है रोम मे।
कालांश का शिवांश लो,
उतर चली धरा पर यूँ।
तब्दीलियाँ उद्गार बन,
पसर गई ज़मीन पर।
मशीनों की चादर,
फैला दिया यूँ पंख ने।
प्रकृति का दोहन यूँ,
करते रहे अनवरत।
शिवांश तेरी शक्ति ने,
सीख यूँ दे दी हमें।
समन्वय का सूरज,
रोशन करे जहाँ को।
मशीने भी हो,
विज्ञान भी हो।
प्रकृति भी हो,
पर संहार न हो।
प्रदूषण भी न हो,
संदूषण भी न हो।
विज्ञान हो,
पर शोषण न हो।
समझ लिए,
तेरी सीख हम।
सबक ले चले हैं हम,
करेंगे विकास हम,
प्रकृति को संभाल कर।
रक्षित कर आगे बढ़ें,
नदियों को हम साफ़ रखें।
प्रकृति के उपहार को,
समेट कर संजोकर।
अपनी ये धरोहर,
सदियों तक समेटकर।।
- -अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. The artwork belongs to Dhruvi Acharya(found via gallerychemould.com)
सोमवार, 25 मई 2020
यादों के रंग
यादों के रंग
तुमसे बिछड़े तो ऐसा लगा,
कि जी न सकेंगे हम।
हर पल समेटा है,
तेरे यादों के रंगो को।
तन्हाई इन रंगो को,
देता है चित्र भी।
ये चित्र मेरे दिल को ,
देतें है शब्द - ध्वनि।
ये नाद हिंडोले- सी,
देतीं है मेरे मन को।
ये मन इन नादों से,
हो जाते हैं बोझिल।
ये बोझ हट जातें हैं ,
तेरी यादों के रंगो से।
लगता हैं जीवन,
दर्द का कोई साया।
यह साया हट जाती हैं,
तेरी यादों के रंगो से।
तुमसे बिछड़े तो,
ऐसा लगा कि,
जी ना सकेंगे हम।
हर पल समेटा हैं,
तेरी यादों के रंगो को।
मेरा हर पल तेरी,
यादों का मंजर हैं ये।
मेरे जीवन की सीढ़ियों का ,
कण -कण हैं ये।
मन में ये तेरी सूरत ,
छिपा कर बैठी हूँ यूँ।
जैसे पुष्प छुपाये रहता,
हैं अपने सुगंध को।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations.
लेबल:
anupama upadhyay,
calming,
conscience,
deep,
feel good,
friends,
friendship,
good times,
happiness,
life,
light,
love,
memories,
nostalgia,
poems,
poetry,
positivity,
relationship,
soothing
स्नेहिल पंख
स्नेहिल पंख
वायु के झोंके ,
हैं उल्फत की लहरें।
फूल की खुशबू,
हैं उल्फत के रोम।
समुंदर की लहरें,
हैं प्रेम की तरंगे।
पेड़ों की छांव,
हैं उल्फत की तृप्ति।
नील गगन के तारे,
हैं उल्फत की सीमाएं।
चाँदनी का अमृत,
हैं प्रेम का रसपान।
वायु के झोकों को,
तुम कैद नहीं कर सकते।
फूल की खुशबू को ,
मुट्ठी में नहीं ले सकते।
समुंदर की लहरों को ,
तेरा यंत्र नहीं सोखेगा।
पेड़ों की छाँव को,
सूखा तो नहीं सकते।
नील गगन के तारों को ,
उड़ा तो नहीं सकते।
चाँदनी के रसपान को ,
मिटा तो नहीं सकते।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. Art by Deborah Milton.
बुधवार, 13 मई 2020
आँसू
आँसू
बादलों के बीच दामिनी बन कर,
घिर आती है गमों की बदली।
नैनों से नीर ओस की बूंदे बनकर,
टपक आती हैं पलको तलक।
मन का नगर बोझ सागर बन,
उमड़ती हैं हिंडोले लेकर।
आत्मा जब पंखुड़ी बन,
लुढ़का देती ओंस की बूंदे।
दिल में नई ज्योति बनकर,
बजा जाती हैं मधुर बीने।
फिर जाता है मन घुमड़कर,
मिट जाती है बदली दुःख की।
चांदनी के साथ फिर तो,
चाँद गाता नव मधुर।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. Art credited to pinterest community.
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)
You might also like...
देश भक्ति
नन्हे मुन्ने बच्चे हम , देश हमारा सुंदर जी। मेरे साथ बोलो , जय हिंद जय हिंद । साफ सफाई रखते हम, ...
-
अँधियारों के भटकाव तले तू तेज़ रौशनी लौ की है। तेरे सन्मार्ग पर चलकर हम गिरते उठते फनका...
-
नन्हे मुन्ने बच्चे हम , देश हमारा सुंदर जी। मेरे साथ बोलो , जय हिंद जय हिंद । साफ सफाई रखते हम, ...
















