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शुक्रवार, 8 जनवरी 2021
लक्ष्य
कागज़ की नौका से,
लेबल:
ambition,
change,
conscience,
deep,
feel good,
fierce,
freedom,
good times,
happiness,
helping others,
india,
life,
light,
matyr,
revolution,
sacrifice,
struggle,
women empowerment
रविवार, 27 दिसंबर 2020
प्रिय
प्रिय
जीवन -राह में साये -सी,
पल -पल मैं यूँ बन जाऊँगी।
हर- दिन की प्रातः लाली -सी ,
चेहरे पर मैं छा जाऊँगी।
चिड़ियों की चहचहाहट में,
आहट मेरी ही पाओगे।
खिड़की से ये अंडे -चूजे,
यूँ याद मेरी ही सतायेंगे।
जितना ही दूर करोगे मुझको,
पास मैं उतना आऊँगी।
हर -धड़कन में साँसें बनकर,
जीवन -ज्योति बन जाऊँगी।
सबसे नहीं सिद्धांत यह - मेरा
पर तुझसे ऐसा क्यों है ?
जब भी यह पूछोगे खुद से,
तुम प्रियतम भाव ही पाओगे।
हाँ। प्रियतम- भाव ही पाओगे।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
मंगलवार, 22 दिसंबर 2020
ख्वाहिश ही जीवन
ख्वाहिश ही जीवन
मन की किताब खोलूँ ,
तो ख्वाहिशों के पन्ने।
पन्नो पर अंकित शब्द ,
यूँ झूमते गज़ल हों।
मांझी भी तो तूं है,
पतवार भी तो तूं है।
जीवन तू है धारा,
पानी सा बहता पल है।
जीवन हमें बढ़ाती,
, यूँ तेज़ धार करके।
बढ़ता रहे तूं यूँ ही ,
ले ख्वाहिशों की डोरी ,
जीवन को इनसे- कस कर,
ले बढ़ ले- तूं बढ़ कर।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. The art belongs to Sara Riches
शनिवार, 5 दिसंबर 2020
अंतस्तल
अंतस्तल
सोचती हूँ मैं शांत व निश्चल,
क्यों हो जाता है अंतस्तल।
रे निश्चल !क्या राज़ है तेरा।
क्या पाई ! क्या पाई तूने मादकता।
तेरी मोदकता ! का रहस्य छिपा नहीं ,
हर कण -कण में तू रहा सही।
पर तेरी पूजा करता संसार ,
है नश्वर मायावी अल्फ़ाज़।
करता बुराई प्रेम की ,
मरता इन्ही के रेत से।
ये नश्वर मायावी संसार ,
तेरी पूजा करता दिन -रात।
नहीं जानता यह नादान,
क्या है तेरे मन का राज़।
डूबा लेता तू अंतस्तल को ,
मिटा देता मेरे अंतर्तम को।
दिखा देता है नई ज्योति ,
मिटा देता है मन का क्लेश।
मन घुमड़कर -उमड़ -उमड़ कर,
भिगो जाती ओसीली बूँदे।
नम कर देती हैं ये बूँदे ,
अधखिले सुमन उरवर को।
सूरज की नई प्रभा ,
खिला जाती सुमन रमां।
मिटा जाती हैं सारे क्लेश ,
भर जाते उर मधुर मिलन से।
चांदनी के साथ फिर तो ,
चाँद गता नव मधुर।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations
गुरुवार, 26 नवंबर 2020
काले बादल गर्जन करते
काले बादल गर्जन करते
काले बादल गर्जन करते ,
माना की कोरोना क़ायम है ,
यूँ अर्थ- व्यवस्था घायल है।
रातें अँधेरी फैली हैं,
काले बादल भी घेरे हैं।
बिजली भी यूँ खिखियाती हैं ,
बच्चे-बूढ़े भी आहत हैं।
ये रात अँधेरी मिट जाएगी ,
सूरज फिर से चमकेगा।
बादल तेरी इस गर्जन को ,
तरकश ले सूरज निकल चला।
काले बादल अब छिप ले तू ,
तेरी गर्जन को चुप करने ,
लो बढ़ ले आभा प्रकट हुई।
तेरे किस हिस्से में बिजली ,
कोइ मुझको बतला तो दे ,
ले बटन दबा यूँ मुक्त करूं ,
जिससे बच्चे डर जाते हैं,
उन घिरते काले बादल से ,
पानी की थैली मैं ले लूँ ,
ले कृषक की तकती आँखों को ,
पानी की थैली मैं दे दूँ।
इन प्यासी धरती कण -कण को ,
झम -झम बारिश से मैं भर दूँ।।
हाँ! उर्वरता से इनको भर दूँ।।
अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations.
सोमवार, 16 नवंबर 2020
सच्चरित्र
सच्चरित्र
सद्भावना है पता मेरा,
भाव ही हृदय है।
विचारों की गलियों में ,
गूंजता ए स्वर है।
प्रेम ही निवास मेरा ,
मित्रता ही नियति मेरी।
जीवन ही राग मेरा ,
स्नेह ही उड़ान मेरी।
संवेदना की अनुभूति ,
मानवता ही धर्म मेरा।
स्नेह -सद्भावना के आँचल -तले ,
पलता -पोषता ए चरित्र है।
कुदरत तेरी -काया के ,
रूप यूँ अनेक है।।
- अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020
श्रम का मूल्य
श्रम का मूल्य
मखमली -घास पर चलना- चलते रहना,
पसंद है मुझको।
पर ! धरती -फाड़ श्रम-सिंचित बूंदे तेरी ,
द्रवित करती हैं मुझको।
सुंदर रेशम- से लिपटी तराशती-काया ,
मोह से मोहित करती है मुझको।
पर ! धागों की- चुभन से छिलती उँगलियों के ज़ख्म तेरे ,
मेरी आँखों में अश्क़ बन छलकतीं है जमीन पर।
ये तश्तरी -भर- खाने की लज़ीज़ स्वाद से लतपथ ,
चाटती हूँ मैं सराबोर हो उँगलियाँ अपनी।
पर ! रसोई में दिन -रात का समर्पण व निष्ठा तेरी ,
रौंद देते हैं मेरे सारे जज़्बात को।
मेरे मित्र ! तेरा श्रम व निःस्वार्थ संवेदना तेरी ,
झकझोरतीं हैं मेरे भोग -निष्ठ स्वार्थ को।
जिधर भी देखूं !,उधर ही तश्वीरें श्रमिक के शोषण की।
श्रमिक को रोटी नसीब नहीं ,भोगी को भोग का मूल्य नहीं।
भोगी तू कर ले श्रम थोड़ा आगे बढ़कर ,
जी ले जीवन "इनका" तू भी एक पल।
हाँ ! जी ले हम भी जीवन "इनका" एक पल।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
शनिवार, 17 अक्टूबर 2020
जो तुम आ -जाते एक बार (part-2)
जो तुम आ -जाते एक बार (part-2)
जो तुम आ -जाते एक बार
धुल जाते सारे राग-ताप।
जो तुम आ -जाते एक बार।
ऐसी चुप्पी क्यों साथ -साथ ,
जिसमें सन्नाटों की बास।
जो देते जख्मों पर आघात ,
जो तुम आ -जाते एक बार।
सुन लेती तुम जो मेरी बात ,
सन्नाटों में होते धुन हजार।
नजरें कर देती शिक़वे बयान।
रिमझिम झींसे- स्नेहिल तार,
भेदे मिटते सारे संताप।
छंट जाते बादल पृथक तार।
हो जाते मन भी खुशगवार।
जो तुम आ -जाते एक बार।
बोझिल मन भी हो शांत -शांत ,
बाहर मौसम भी खुश मिज़ाज।
सोने का सूरज साथ -साथ,
रोशन करता ये गुलिस्तां।
जो तुम आ -जाते एक बार।
संपने बुनती मैं बार -बार ,
कर आँखों से बातें हजार।
जो तुम आ जाते एक बार।
धड़कन भी करती सौ बात ,
हर आहट नजरें झाँक-झाँक।
जो तुम आ -जाते एक बार।
मधुरम बेला करते तलाश ,
संग ख्वाबों में भी बांध शमाँ ।
जो तुम आ -जाते एक बार।
खुद से करती बातें हज़ार।
पल -पल करती मैं इंतजार ,
जो तुम आ -जाते एक बार।
संवेगों की ये तीक्ष्ण चाप ,
कर देती मुझको हैरान।
जो तुम आ -जाते एक बार।
यांदो की विस्मृत ये उड़ान ,
गूँथी मंजरियों संग याद,
जो तुम आ -जाते एक बार।
भावों के मंजर साथ -साथ,
पलते रिश्ते की हर शाख।
जो तुम आ -जाते एक बार।
बदले -बदले से हर तार ,
मुद्रा भी करती नृत्य -नाद।
जो तुम आ -जाते एक बार।
भावों के भाव -थपेड़ों में ,
पल -पल गुजरे जो साथ -साथ।
जो तुम आ -जाते एक बार।
जीवन शिक़वे के भी हज़ार ,
कर लेते मिल दो -चार -हाथ।
जो तुम आ -जाते एक बार।
जीवन के इतने रंग -तले ,
हम भी बन जाते चित्रकार।
जो तुम आ -जाते एक बार।
हर रंगों की अपनी है छाप,
ले -लेते ठप्पे साथ -साथ।
जो तुम आ -जाते एक बार।
मधुरम काया ले साथ -साथ,
घुल -मिलकर रहते साथ -साथ।
जो तुम आ -जाते एक बार।
जीवन के इन चलचित्र तले,
दुःख में भी रहते साथ -साथ।
जो तुम आ -जाते एक बार।
सूई-धागे बन साथ -साथ,
गूँथते रिश्ते के हर तार,
जो तुम आ जाते एक बार।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. Image from efficacy.org
गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020
जो तुम आ जाते एक बार (part-1)
जो तुम आ जाते एक बार (part-1)
जो तुम आ जाते एक बार ,
बातें कर लेती मैं हजार।
जो तुम आ जाती एक बार।
गीले -शिक़वे सब भूल -भाल ,
हो जाते हम -तुम साथ -साथ ,
जो तुम आ -जाते एक बार।
मुग्धा करते ये तेरे भाल ,
अविरल अश्रु से भीग -भाग।
जो तुम आ -जाती एक बार।
तेरे अंतस्थल छेंद बाण,
कर देती शिक़वे चूर -चूर ,
उमड़े नयनों में प्रलय-प्रवाह।
जो तुम आ जाते एक बार।
अंतस्तल के संवेग -तले ,
फिसलते शिक़वे साथ -साथ ,
कुछ तुम कहते -कुछ हम कहते ,
मिटते सन्नाटों के तार,
जो तुम आ -जाते एक बार।
पल -पल तांडव के सुर -ताल ,
मन में करते अंतर्नाद।
जो तुम आ -जाती एक बार।
हो जाते हम भी एक साथ ,
जो तुम आ -जाते एक बार।
उमड़ते सारे भाव -प्रलाप ,
भीगे नयनों से कर के वार,
हिंचकोले खाते अश्रु -तार ,
नथुनों संग करते आघात ,
जो तुम आ -जाते एक बार।
करते गातों से युद्ध -वार ,
ज्वाला बन भी करते आघात।
जो तुम-आ -जाते एक बार।
ह्र्दय-भेदे जब अश्रु -तार ,
मिट जाते सारे हृदय-ताप।
जो तुम आ -जाते एक बार।
सुन लेते मेरी तुम जो बात ,
हर लेते मेरे हृदय -ताप।
खोल जो देते हृदय -द्वार ,
हो जाते हम भी पास -पास।
जो तुम आ जाते एक बार।
- अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the images. The illustration was taken from pngio.com
**the poem was inspired by one of the greatest works of Mahadevi Verma, "Jo Tum Aa Jaate Ek Baa"
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2020
निद्रा
निद्रा
बंद आँखों में संजती सदा,
खुली आँखों में वास तेरा।
पलकें खोलूं तो सबेरा ,
बंद आँखे गहन अँधेरा।
ये अँधेरी रात तलाशती तुझको ,
तेरे आने की दस्तक बताती मुझको।
घुमड़ -सिहरन की चोट सी ,
उमड़ती आँखों में विश्राम तू।
तेरे आने से श्रांत होती धड़कन ,
नस -नस बिखेरती सिहरन।
तेरे छूने से मन विश्राम करता मेरा ,
दिलो -धड़कन भी आराम करता मेरा।
तेरे होने से चार्ज होता हर पल ,
तेरा आना विश्राम देता तत्क्षण।
हलचल तेरा तरोताजा करता मुझको ,
नई सुबह ला जगाता मुझको।
स्फूर्ति सुनहरी रश्मियों को बिखेरकर,
नव जोश भर राह पर चलाता मुझको।
पथ चुन आगे बढ़ाता मुझको,
कशिश को कोशिश भी बनाती तू ही।
मुस्कान भर मंजिल तक पहुँचाती तू है।
तेरा होना यूँ जरूरी सा लगता मुझको ,
जिंदगी में श्वासों का होना जैसे।।
- अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustration. The image was added from society6
शनिवार, 25 जुलाई 2020
जिंदगी गुदगुदाती है
जिंदगी गुदगुदाती है
जिंदगी एक खुशनुमा एहसास है तू,
प्रेम,स्नेह,भरोसा,विश्वास के साथ है तू।
आशा की चादर ओढ़ चैन की नींद देकर,
आगे-बढ़ नीलांबर छूने की ख़्वाब है तू।
ख़्वाबों की तकिया लगाकर सुलाती है तू,
उम्मीदें जगा थपथपाती है तू।
तेरे साथ रहना अच्छा लगता है ,
तेरा-हर शब्द सच्चा लगता है।
राह चलते काँटों का एहसास देती है तू,
चुभन हटाकर आगे भी धकेलती है तू।
सच-झूठ का फर्क बताकर हमें,
सच्चा-राहगीर बन साथ निभाती है तू।
धुप-छांव तेरे- शाखों से,
अठखेलियाँ यूँ करते है ,
जैसे नन्हा-शिशु पानी में,
पकड़ता हो प्रतिबिम्ब अपनी।
पल-पल तेरा विस्मित कर,रिझाता है मुझको,
गुदगुदा-कर यूँ गले भी लगाता है मुझको।
भरोसा-विश्वास की चादर-तले अठखेलियाँ करती,
आशा के पंख फैला हमें मोहित करती।
तेरा विस्मय-रिझाना अच्छा लगता है ,
तेरा साथ प्यारा लगता है।
तेरा हर पल मेरे एहसास को गुदगुदाता है,
पल-पल बढ़ने को उकसाता है।
नील अंबर छूने की चाह लिए,
संकल्प ले कर्म को जगाता है।
तू प्यारा भी है,तू मोहक भी है,
तेरा हर-क्षण मुझे गुदगुदाता है।
तेरा प्यारा-सा स्पर्श मुझे,
आगे बढ़ने को उकसाता है।
ज़िंदगी तू मीठी व मोहक-बन ,
हर क्षण मुझे गुदगुदाती है।।
अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations.
सशक्त समाज
सशक्त समाज
सुंदर सुकुमार सलोने पल,
मीठी -भीनी भौरे -गुनगुन।
आकाश पटल सुंदर -मधुमय,
यूँ नील-सरोवर तट तक हो।
देखूं -छूं-लूँ की चाह भरे,
नतमस्तक -लोचन नयनों से।
रिमझिम-झींसें बरसात लिए,
मन -भींगे रिमझिम बूंदो से।
सूरज की लाली अरुण लिए,
अरुणिम -प्रभा मुखरित कर ले।
नव-युग कर ले अभिनंदन अब ,
चल-बढ़ ले अब तू साथ मेरे।
जब-गलियों में सुख -शांति चले,
हो-मोदक मुखरित घर -आंगन।
निर्भय -निःसंशय स्वर मुखरित,
नारी के बोल सँजे आंगन।
सशक्त -कदम से निर्भय बढ़,
हर गलियाँ,मोड़,गली,नुक्क्ड़।
मधुहास भरे निर्भय-मन से,
हर माँ-बेफ़िक्र रहे हर- क्षण।
लो अरुणिम आभा साथ लिए,
नव-शोध लिए नवाचार लिए।
महिला के हाथों में अद्भुत,
सुख-समृद्धि का मशाल जले।
इसकी लौ में सब साफ़ दिखे,
हर-मुश्किल भी आसान लगे।।
- अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. The painting belongs to Ramona Pintea.
रविवार, 5 जुलाई 2020
संकल्प
संकल्प
वह आदमी आदमी -ही क्या,
जिसके जीने का मकसद न हो।
वह चिराग चिराग-ही क्या,
जिसकी तेज -रोशनी न हो।
वह सफ़र सफ़र -ही क्या,
जिसकी कोई मंजिल न हो।
वह मंजिल मंजिल -ही क्या,
जिसकी राहें कठिन न हों।
हौसले बुलंद हों अगर,
तो रास्ते आसान है।
मंजिल तो मिलेगी ही,
चाहे लाख तूफ़ान हो।
रश्मि तेरे तेज की,
मिटा देगी तूफ़ान को।
बनके हम-सफ़र वह,
पनाह देगी-छाँव की।
- अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the images
शहादत
शहादत
आओ डूबें उस प्रतिपल में,
क्रंदन -रुदन के हर स्वर में।
हो चीत्कार हर आँगन में,
हर ममता के घर -आँगन में।
हर -बहना के उर-क्रंदन से,
ममता के निज हिय -रुदन से।
हर प्रतिदान अनोखी जिसकी,
माँ का रूदन हो अस्तित्व की।
निकले एक अनोखी आग,
लपटें दें हर पूत का दान।
इस विचित्र प्रतिदान का राज,
छुपा नहीं तुझसे ऐ भारत -महान।
हर पत्नी का सिंदूर ही,
जो निज देश का रक्षक था।
मातृ -भूमि का प्रहरी ही,
जिनकी सांसों में अंकित था।
आओ मिल सब डूबें उसमें,
भगत सिंह व राजकुंवर में।
गाँधी ,सुभाष जैसे प्रहरी में।
नेक आत्माओं की जय घोष,
लगाले ऐ भारत महान।
कर ऐसा उद्घोष जगत में,
सृष्टि के कोने -कोने में।
राग व बीणा -बीने बन,
डूबें अतीत के उन प्रतिपल में।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the images.
शनिवार, 27 जून 2020
संबंध
संबंध
मैंने सोचा कुछ काव्य लिखूं, संबंधों पर कुछ वाक्य लिखूं।
पड़तीं नजरें इन पन्नों पर, अभिलाषित हो यूँ मुखर उठीं।
संबंध तो मेरा है तुझसे, हर -पल मैं तेरे पास रहूं।
चाहे खुशियाँ हो या गम हों, भावों से भरकर प्यार करूँ।
हर शब्दों में, हर बोल मे मैं ही।
मुखरित हो, भव जाल बुनूँ।
सोचा न कभी मैंने तुझको, किस रिश्ते से तुमको जोड़ूँ।
तूँ पास है मेरे हर -पल यूँ, सांसो की डोर से बँध के तूँ।
तू खिलती रह , मदमस्तक हो।
तेरी उड़ती ,इन भावों में।
तेरी उड़ती इन भावों में, मैं भी डुंबू इठलाती रहूं।
नतमस्तक हो, इन ख़्वाब तले।
तेरे-मीठे इस रिश्ते को ,महकाती पल्लव -आँचल सी।
लो पकड़ कलम की स्याही से ,पुलकित स्वर में संबंध लिखूं।
तूँ साँस है मेरी ,मैं जीवन हूँ।
रिमझिम बारिश की बूँदे तूँ।
तू अरुण है मेरी ,मैं अनिमा।
यूँ ख़्वाब सजे , मन मोहित हो।
सारे संबंध को नाम तो दे दूँ ,पर तुझको मैं नाम न दूँ।
समय -प्रवाह में बहते -गिरते ,टूटे -फूटे सारे रिश्ते।
पर तुझसे मेरा रिश्ता ,यूँ सागर के लहरों का उठना।
जितना ढूढूँ उतना मिलता ,न जाने कितने रत्न जड़े।
विभूषित काया-सी साथ चलूँ ,तेरे अरमान लिए हर -पल।
पल -पल प्रमुदित स्नेहिल बूँदे,तेरा -मेरा श्रृंगार करे।
भावों के भाव थपेड़े बन ,पल -पल पन्नो पर ख़्वाब पले।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the images
बुधवार, 17 जून 2020
ये आँखें भी कुछ कहतीं हैं
ये आँखें भी कुछ कहतीं हैं
मेरी-आँखें,उनकी-आँखें।
इनकी-आँखें ,सबकी-आँखें।
निःशब्द सँजे,हर बोल लिए।
ये आँखे,सब कुछ कहतीं है।
मां-की-आँखें,कुछ ख्वाब सँजे।
स्नेही मधुरम,श्रृंगार करे।
मीठी-मीठी,मुस्कान लिए।
मां-की-आँखें,कुछ कहतीं हैं।
सुधार भरे,कटु-वार करे।
तिरछे नयनो से,वार करे।
कटु-तार लिए,भेदे मुझको।
संभलने को,तैयार करे।
मेरी-आँखें,उनकी-आँखें।
इनकी -आँखें,उनकी-आँखें।
इन-आँखों की,क्या बात करूं।
हर-पल ये,कुछ -कुछ कहतीं हैं।
पापा की नजरें, घूरे यूँ।
नव-जोश भरे, नव प्राण भरे।
तत्पर करती, कर्मठता को।
श्रम करने का, आग़ाज़ भरे।
मेरी-आँखें, उनकी-आँखें
इनकी-आँखें, सबकी-आँखें।
नजरों के भाव, थपेड़े भी।
पल-पल मुझसे, कुछ कहतीं हैं।
भाई-बहनों,की नजरें भी।
वर्चस्व लिए, हुँकार भरे।
निःशब्द सने, उन बोलो में।
न जाने क्यों, धमकाते हैं।
मेरी-आँखें, उनकी-आँखें।
इनकी-आँखें, सबकी-आँखें।
निःशब्द सँजे, मन-की-आँखें।
तस्वीरों को, समझातें हैं।
मित्रों की बातें, क्या बोलूं?
इनकी- आँखें, क्या कहतीं हैं।
ना-बोले, ये ना-बात करें।
इमोजी में, सब बयाँ करें।
मेरी-आँखें, उनकी-आँखें।
इनकी-आँखें, सबकी-आँखें।
इन-आँखों की, दस्तूर मैं क्या।
चंद लब्ज़ो, में बयाँ करूं।
मां मेरी, रीढ़ की हड्डी हैं।
तो ब्रेन मेरा, हैं पापाजी।
भाई-बहनें, मेरी-आँखें।
तो मित्र मेरा, बहता-पानी।
रिश्तें-सारे ही, मधुरम हैं।
इनकी खुशबू में, मैं सन लूँ।
आबाद हों, इनकी नजरें भी।
गुलशन मेरा, आबाद करें।
मुझे-प्रेम करें, मुझे-स्नेह भी दें।
अपने-मधुरम, इन नजरों से।
इन नजरों की, मैं कायल हूँ।
भीगूँ-डूबूँ , इन नजरों मे।।
अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations
मंगलवार, 16 जून 2020
चित्त
चित्त
न सुर है, न ताल।
न लय है, न लावण्यता।
पल -पल बजती है जो,
वह है चित्त की चंचलता।
बाँधू मैं, तो बिखरे ये।
पकड़ूँ मैं तो भागे ये।
जकड़ू मैं, तो फैलता जाये।
रोकूं मैं तो चलता जाये।
छोड़ दूँ तो थिरकता है,
नए ताल बजाता है।
नीरव ताने छेड़े तत्क्षण,
जब खो जाता मन अंतस्तल।
मन हो जाये जब भी खिन्न,
कर देता तत्क्षण ये मलीन।
कोई दे सकता क्या ऐसा,
जिसमे हो,चित्त की स्थिरता।
रहूँ शांत, पर प्रेम उद्वेलित।
छूं कर भी न हो नीरवत।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations.
रविवार, 7 जून 2020
प्रकृति
प्रकृति
संकुचाते सम्भले लोचन से ,पलकें यूँ नीचे गिरतीं हैं।
मानों ओसीली बूँदे यूँ, पत्तों से यूँ फिसलते हों।
आकाश की रिमझिम बूंदें बन, धरती की ताप को हरती है।
यूँ ही तुम आंसू की बूँदे, मन के संताप को हरती हो।
लो फ़िसल गयीं ये बूँदे भी, सनकर सारे संताप हरे।
मन थिरक उठा अब होठों पर,अपनी विस्मृत मुस्कान लिए।
कुदरत तेरी इस सृजन में, न जाने कितने विस्मय हैं।
अचम्भित कर देतीं मुझको,न जाने कितने रंग भरे।
अपनी बातें खुद से कर लूँ,मन में सारे प्रश्नों को ले ।
इन प्रश्नों के उत्तर भी तो ,दे देता तूँ शब्दांश तले।
मन घुमड़-घुमड़ न जाने क्यों,घूमता -फिरता संवाद करे।
संवाद भरे इन बोलों से,यूँ रंग -मंच श्रृंगार करे।
जीवन के अद्भुत रंगों से,विस्मय अनुभूति चित्र सजे।
सोंचू मैं तो पाऊँ तुझको,फिर क्यों मैं कोई रंग भंरु?
तू सृष्टा है ,मैं कृति हूँ तेरी।
अभिलाषित स्वर अब मुखरित हो।
जीवन के चित्र सजे यूँ ही,मन थिरकन का स्पंदन हो।
रंगो की चटख रश्मियों से,जीवन का चित्र मनोरम हो।
ये जीवन तुझको है अर्पण,सौगात जो तूने दी मुझको।
मन प्रमुदित हो अभिलाषित हो,पल -पल तेरे इन रंगों से।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the vector illustration.
शुक्रवार, 5 जून 2020
कोरोना
कोरोना
कोरोना एक परिहास नहीं,
शिवांश है ये।
युग की तब्दिलियों का उद्गार बन,
कर चुकी शंखनाद है ये।
क्षितिज के आक्रोश से,
धरा सिमट चुकी थी तू।
शिवांश धरा पर मुखर ,
कर रहा प्रतिकार ये।
धुंध आसमान का,
चीर कर बढ़ा है तू।
नील अंबर का पट,
लो फिर से संवर गई।
शिवांश धरा पर अब,
कुछ यूँ ये उतर चली।
तपन की प्यास,
जो मशीने मिटाती।
चाँदनी सी श्याह बन,
समां चुकी है रोम मे।
कालांश का शिवांश लो,
उतर चली धरा पर यूँ।
तब्दीलियाँ उद्गार बन,
पसर गई ज़मीन पर।
मशीनों की चादर,
फैला दिया यूँ पंख ने।
प्रकृति का दोहन यूँ,
करते रहे अनवरत।
शिवांश तेरी शक्ति ने,
सीख यूँ दे दी हमें।
समन्वय का सूरज,
रोशन करे जहाँ को।
मशीने भी हो,
विज्ञान भी हो।
प्रकृति भी हो,
पर संहार न हो।
प्रदूषण भी न हो,
संदूषण भी न हो।
विज्ञान हो,
पर शोषण न हो।
समझ लिए,
तेरी सीख हम।
सबक ले चले हैं हम,
करेंगे विकास हम,
प्रकृति को संभाल कर।
रक्षित कर आगे बढ़ें,
नदियों को हम साफ़ रखें।
प्रकृति के उपहार को,
समेट कर संजोकर।
अपनी ये धरोहर,
सदियों तक समेटकर।।
- -अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. The artwork belongs to Dhruvi Acharya(found via gallerychemould.com)
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