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शुक्रवार, 8 जनवरी 2021
लक्ष्य
कागज़ की नौका से,
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women empowerment
रविवार, 5 जुलाई 2020
शहादत
शहादत
आओ डूबें उस प्रतिपल में,
क्रंदन -रुदन के हर स्वर में।
हो चीत्कार हर आँगन में,
हर ममता के घर -आँगन में।
हर -बहना के उर-क्रंदन से,
ममता के निज हिय -रुदन से।
हर प्रतिदान अनोखी जिसकी,
माँ का रूदन हो अस्तित्व की।
निकले एक अनोखी आग,
लपटें दें हर पूत का दान।
इस विचित्र प्रतिदान का राज,
छुपा नहीं तुझसे ऐ भारत -महान।
हर पत्नी का सिंदूर ही,
जो निज देश का रक्षक था।
मातृ -भूमि का प्रहरी ही,
जिनकी सांसों में अंकित था।
आओ मिल सब डूबें उसमें,
भगत सिंह व राजकुंवर में।
गाँधी ,सुभाष जैसे प्रहरी में।
नेक आत्माओं की जय घोष,
लगाले ऐ भारत महान।
कर ऐसा उद्घोष जगत में,
सृष्टि के कोने -कोने में।
राग व बीणा -बीने बन,
डूबें अतीत के उन प्रतिपल में।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the images.
बुधवार, 13 मई 2020
कोख में पलती बिटिया
कोख में पलती बिटिया
बीते युग का अंश बन
वर्तमान की छाँव हूँ
भविष्य की प्रणेता बन
मनुष्य की पहचान हूँ
अस्तित्व का अंश नहीं
अस्तित्व की नीव हूँ मैं
वर्तमान का परिणाम नहीं
वर्तमान का आधार हूँ मैं
छोटे -बड़े सुंदर- सलोने
हर व्यक्ति की माँ हूँ मैं
मारोगे तो खो दोगे
मनुष्य के वर्चस्व को
मैं ही तो जननी हूँ
पुत्री हूँ पत्नी हूँ
अपनी पहचान में मैं
सृष्टि का अस्तित्व हूँ
मेरे खातिर नहीं
स्वयंम के वर्चस्व को
बुझने मत दो
कोख के हर बेटी को
जीने दो
पलने दो
पुत्री बन
युग के धरातल पर
ढलने दो
शक्ति व् आत्मा को
धरती पर सजने दो
नव युग की चेतना को
तुम मुस्कुराने दो
आने दो बेटी को
सपनो को संजने दो
उसकी मुस्कान में
हमारी ही जय होगी
उसके विकास में ही
सत्य का उद्धघोष होगा
नन्हे हाथों में ही
हमारी नियति होगी
उसकी सांसो में
हमारी ही महक होगी
उसकी आवाज में
हमारी ही बोल होंगे
उसकी पहचान में
हमारी ही छवि होगी
आने दो सृजा को
बसने दो सृस्टि को
आने दो मृदा को
पल्ल्वित हो सृष्टि
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. Th sketch here belongs to Drishty Vashishtha found on quora.
शुक्रवार, 8 मई 2020
नव युग की शुरुआत
नव युग की शुरुआत
नव प्रभात का सूरज
निकस ब्योम आँचल से।
बादलो को चीरता
प्रकाश को चुनता।
राह की कठिन तपिश से
मुश्किलों से जूझता।
संघर्ष की पीड़ा
चेतना को चीरता।
नव प्रभात बन कर
जीवन को जोड़ता।
चेतना की छाया में
पथिक होता है श्रांत।
तिमिर के तिरोहन से
पथ होता है शांत।
तब कहीं होती है
नव युग की शुरुआत।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. The art belongs to SL Haldankar.
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