हृदय की ललक
अपने सुरभि के प्याले से ,
भर दे -भर दे मेरा अंतस्तल।
अपने मकरंद की लावण्यता से,
भर दे -भर दे मेरा बाह्य परत।
मेरी आवाज भौरे की गूँज,
शब्द मेरे हों शहद मिठास।
कर दे -कर दे मेरी वाणी,
तू मधु विटप सा ही कर दे।
तेरे पराग की विस्तृतता,
मेरे जीवन की झांकी हो।
प्रभु देना है तो ऐसा दो,
जैसा दिया तूने मधु विटप को।
जो जीते जी बन डाली शोभा,
कर दे सिंचित पुलकित मन को।
मरते दम तक भी वो बन के,
किसी सेहरे की शोभा है।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the image. The illustration here is a painting credited to Priyamvada Bhanger
