बेटी
बेटी पापा की ताज़ है तू ,
घर -आंगन की पहचान है तू।
तेरे किलकारी से गूंजे ,
महके घर -आंगन में खुशबू।
संगी- मां की हमदर्द- पिता ,-
सशक्त कदम से बढ़ती तूँ।
तेरी -धड़कन तेरी शाया ,
पल -पल देती एक छांव है तूँ ।
मेरे धड़कन की राग है तू ,
स्वर -ब्यंजन की भी छाप है तू।
स्नेहिल मधुरं कुदरत कृति ,
इनकी अनुपम सौगात है तू।
बेटी कुदरत के रचना की ,
अनुपम अप्रतिम उपहार है तू।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
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