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शुक्रवार, 8 जनवरी 2021
लक्ष्य
कागज़ की नौका से,
लेबल:
ambition,
change,
conscience,
deep,
feel good,
fierce,
freedom,
good times,
happiness,
helping others,
india,
life,
light,
matyr,
revolution,
sacrifice,
struggle,
women empowerment
मंगलवार, 15 दिसंबर 2020
बेटी
बेटी
बेटी पापा की ताज़ है तू ,
घर -आंगन की पहचान है तू।
तेरे किलकारी से गूंजे ,
महके घर -आंगन में खुशबू।
संगी- मां की हमदर्द- पिता ,-
सशक्त कदम से बढ़ती तूँ।
तेरी -धड़कन तेरी शाया ,
पल -पल देती एक छांव है तूँ ।
मेरे धड़कन की राग है तू ,
स्वर -ब्यंजन की भी छाप है तू।
स्नेहिल मधुरं कुदरत कृति ,
इनकी अनुपम सौगात है तू।
बेटी कुदरत के रचना की ,
अनुपम अप्रतिम उपहार है तू।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. The image was taken from pinterest
शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020
श्रम का मूल्य
श्रम का मूल्य
मखमली -घास पर चलना- चलते रहना,
पसंद है मुझको।
पर ! धरती -फाड़ श्रम-सिंचित बूंदे तेरी ,
द्रवित करती हैं मुझको।
सुंदर रेशम- से लिपटी तराशती-काया ,
मोह से मोहित करती है मुझको।
पर ! धागों की- चुभन से छिलती उँगलियों के ज़ख्म तेरे ,
मेरी आँखों में अश्क़ बन छलकतीं है जमीन पर।
ये तश्तरी -भर- खाने की लज़ीज़ स्वाद से लतपथ ,
चाटती हूँ मैं सराबोर हो उँगलियाँ अपनी।
पर ! रसोई में दिन -रात का समर्पण व निष्ठा तेरी ,
रौंद देते हैं मेरे सारे जज़्बात को।
मेरे मित्र ! तेरा श्रम व निःस्वार्थ संवेदना तेरी ,
झकझोरतीं हैं मेरे भोग -निष्ठ स्वार्थ को।
जिधर भी देखूं !,उधर ही तश्वीरें श्रमिक के शोषण की।
श्रमिक को रोटी नसीब नहीं ,भोगी को भोग का मूल्य नहीं।
भोगी तू कर ले श्रम थोड़ा आगे बढ़कर ,
जी ले जीवन "इनका" तू भी एक पल।
हाँ ! जी ले हम भी जीवन "इनका" एक पल।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
शनिवार, 25 जुलाई 2020
सशक्त समाज
सशक्त समाज
सुंदर सुकुमार सलोने पल,
मीठी -भीनी भौरे -गुनगुन।
आकाश पटल सुंदर -मधुमय,
यूँ नील-सरोवर तट तक हो।
देखूं -छूं-लूँ की चाह भरे,
नतमस्तक -लोचन नयनों से।
रिमझिम-झींसें बरसात लिए,
मन -भींगे रिमझिम बूंदो से।
सूरज की लाली अरुण लिए,
अरुणिम -प्रभा मुखरित कर ले।
नव-युग कर ले अभिनंदन अब ,
चल-बढ़ ले अब तू साथ मेरे।
जब-गलियों में सुख -शांति चले,
हो-मोदक मुखरित घर -आंगन।
निर्भय -निःसंशय स्वर मुखरित,
नारी के बोल सँजे आंगन।
सशक्त -कदम से निर्भय बढ़,
हर गलियाँ,मोड़,गली,नुक्क्ड़।
मधुहास भरे निर्भय-मन से,
हर माँ-बेफ़िक्र रहे हर- क्षण।
लो अरुणिम आभा साथ लिए,
नव-शोध लिए नवाचार लिए।
महिला के हाथों में अद्भुत,
सुख-समृद्धि का मशाल जले।
इसकी लौ में सब साफ़ दिखे,
हर-मुश्किल भी आसान लगे।।
- अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. The painting belongs to Ramona Pintea.
रविवार, 5 जुलाई 2020
शहादत
शहादत
आओ डूबें उस प्रतिपल में,
क्रंदन -रुदन के हर स्वर में।
हो चीत्कार हर आँगन में,
हर ममता के घर -आँगन में।
हर -बहना के उर-क्रंदन से,
ममता के निज हिय -रुदन से।
हर प्रतिदान अनोखी जिसकी,
माँ का रूदन हो अस्तित्व की।
निकले एक अनोखी आग,
लपटें दें हर पूत का दान।
इस विचित्र प्रतिदान का राज,
छुपा नहीं तुझसे ऐ भारत -महान।
हर पत्नी का सिंदूर ही,
जो निज देश का रक्षक था।
मातृ -भूमि का प्रहरी ही,
जिनकी सांसों में अंकित था।
आओ मिल सब डूबें उसमें,
भगत सिंह व राजकुंवर में।
गाँधी ,सुभाष जैसे प्रहरी में।
नेक आत्माओं की जय घोष,
लगाले ऐ भारत महान।
कर ऐसा उद्घोष जगत में,
सृष्टि के कोने -कोने में।
राग व बीणा -बीने बन,
डूबें अतीत के उन प्रतिपल में।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the images.
शनिवार, 27 जून 2020
संबंध
संबंध
मैंने सोचा कुछ काव्य लिखूं, संबंधों पर कुछ वाक्य लिखूं।
पड़तीं नजरें इन पन्नों पर, अभिलाषित हो यूँ मुखर उठीं।
संबंध तो मेरा है तुझसे, हर -पल मैं तेरे पास रहूं।
चाहे खुशियाँ हो या गम हों, भावों से भरकर प्यार करूँ।
हर शब्दों में, हर बोल मे मैं ही।
मुखरित हो, भव जाल बुनूँ।
सोचा न कभी मैंने तुझको, किस रिश्ते से तुमको जोड़ूँ।
तूँ पास है मेरे हर -पल यूँ, सांसो की डोर से बँध के तूँ।
तू खिलती रह , मदमस्तक हो।
तेरी उड़ती ,इन भावों में।
तेरी उड़ती इन भावों में, मैं भी डुंबू इठलाती रहूं।
नतमस्तक हो, इन ख़्वाब तले।
तेरे-मीठे इस रिश्ते को ,महकाती पल्लव -आँचल सी।
लो पकड़ कलम की स्याही से ,पुलकित स्वर में संबंध लिखूं।
तूँ साँस है मेरी ,मैं जीवन हूँ।
रिमझिम बारिश की बूँदे तूँ।
तू अरुण है मेरी ,मैं अनिमा।
यूँ ख़्वाब सजे , मन मोहित हो।
सारे संबंध को नाम तो दे दूँ ,पर तुझको मैं नाम न दूँ।
समय -प्रवाह में बहते -गिरते ,टूटे -फूटे सारे रिश्ते।
पर तुझसे मेरा रिश्ता ,यूँ सागर के लहरों का उठना।
जितना ढूढूँ उतना मिलता ,न जाने कितने रत्न जड़े।
विभूषित काया-सी साथ चलूँ ,तेरे अरमान लिए हर -पल।
पल -पल प्रमुदित स्नेहिल बूँदे,तेरा -मेरा श्रृंगार करे।
भावों के भाव थपेड़े बन ,पल -पल पन्नो पर ख़्वाब पले।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the images
बुधवार, 13 मई 2020
कोख में पलती बिटिया
कोख में पलती बिटिया
बीते युग का अंश बन
वर्तमान की छाँव हूँ
भविष्य की प्रणेता बन
मनुष्य की पहचान हूँ
अस्तित्व का अंश नहीं
अस्तित्व की नीव हूँ मैं
वर्तमान का परिणाम नहीं
वर्तमान का आधार हूँ मैं
छोटे -बड़े सुंदर- सलोने
हर व्यक्ति की माँ हूँ मैं
मारोगे तो खो दोगे
मनुष्य के वर्चस्व को
मैं ही तो जननी हूँ
पुत्री हूँ पत्नी हूँ
अपनी पहचान में मैं
सृष्टि का अस्तित्व हूँ
मेरे खातिर नहीं
स्वयंम के वर्चस्व को
बुझने मत दो
कोख के हर बेटी को
जीने दो
पलने दो
पुत्री बन
युग के धरातल पर
ढलने दो
शक्ति व् आत्मा को
धरती पर सजने दो
नव युग की चेतना को
तुम मुस्कुराने दो
आने दो बेटी को
सपनो को संजने दो
उसकी मुस्कान में
हमारी ही जय होगी
उसके विकास में ही
सत्य का उद्धघोष होगा
नन्हे हाथों में ही
हमारी नियति होगी
उसकी सांसो में
हमारी ही महक होगी
उसकी आवाज में
हमारी ही बोल होंगे
उसकी पहचान में
हमारी ही छवि होगी
आने दो सृजा को
बसने दो सृस्टि को
आने दो मृदा को
पल्ल्वित हो सृष्टि
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. Th sketch here belongs to Drishty Vashishtha found on quora.
शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020
नव युग की ओर ...

नव युग की ओर ...
नव प्रभात नव सूरज बन ,
नव गगन की ओर।
जल प्रपात की लहरे बन कर ,
करें नए युग का सृजन ।
प्रमुदित हो मन मुखरित होकर ,
थाम जरा तू अब समय ।
पल -पल सींचे समय तुम्हे बन ,
माली बन इस वन -उपवन ।
तू भी बढ़ ले ,मैं भी बढ़ लूँ ,
यह चेतन जड़ और चमन ।
समय धरा पर मुखर हो चुका,
बढ़ चल अब तू हो तत्पर ।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. The art above was referenced from the pinterest community.
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