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शुक्रवार, 8 जनवरी 2021
लक्ष्य
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शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020
श्रम का मूल्य
श्रम का मूल्य
मखमली -घास पर चलना- चलते रहना,
पसंद है मुझको।
पर ! धरती -फाड़ श्रम-सिंचित बूंदे तेरी ,
द्रवित करती हैं मुझको।
सुंदर रेशम- से लिपटी तराशती-काया ,
मोह से मोहित करती है मुझको।
पर ! धागों की- चुभन से छिलती उँगलियों के ज़ख्म तेरे ,
मेरी आँखों में अश्क़ बन छलकतीं है जमीन पर।
ये तश्तरी -भर- खाने की लज़ीज़ स्वाद से लतपथ ,
चाटती हूँ मैं सराबोर हो उँगलियाँ अपनी।
पर ! रसोई में दिन -रात का समर्पण व निष्ठा तेरी ,
रौंद देते हैं मेरे सारे जज़्बात को।
मेरे मित्र ! तेरा श्रम व निःस्वार्थ संवेदना तेरी ,
झकझोरतीं हैं मेरे भोग -निष्ठ स्वार्थ को।
जिधर भी देखूं !,उधर ही तश्वीरें श्रमिक के शोषण की।
श्रमिक को रोटी नसीब नहीं ,भोगी को भोग का मूल्य नहीं।
भोगी तू कर ले श्रम थोड़ा आगे बढ़कर ,
जी ले जीवन "इनका" तू भी एक पल।
हाँ ! जी ले हम भी जीवन "इनका" एक पल।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
सोमवार, 18 मई 2020
अंतर्मन
अंतर्मन
चिड़ियों की चहचआहट,
चाहत है उनकी।
फूलों की खुशबू,
यश है उनका।
भौरे की गूंज,
मौज है उनकी।
फूलों की पंखुड़ी,
मुस्कान है उनका।
आकाश के तारे,
दिवानगी है उनकी।
नील अंबर का तल,
आवरण है उनका।
वायु के झोके ही,
रवानगी है उनकी।
ओसीली बुँदे,
नाराजगी है उनकी।
तपन की बारिश सा,
प्यार है उनका।
ऐसे मीत की,
बयान क्या करूँ।
आओ मै तुमको,
नया नाम दूँ।
स्वप्निल ही सांसो में,
अंकित करूँ।
हाँ अंकित करूँ।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we don not own the images. Reference image courtesy by Roula Ayub.
शुक्रवार, 8 मई 2020
नव युग की शुरुआत
नव युग की शुरुआत
नव प्रभात का सूरज
निकस ब्योम आँचल से।
बादलो को चीरता
प्रकाश को चुनता।
राह की कठिन तपिश से
मुश्किलों से जूझता।
संघर्ष की पीड़ा
चेतना को चीरता।
नव प्रभात बन कर
जीवन को जोड़ता।
चेतना की छाया में
पथिक होता है श्रांत।
तिमिर के तिरोहन से
पथ होता है शांत।
तब कहीं होती है
नव युग की शुरुआत।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. The art belongs to SL Haldankar.
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मंगलवार, 14 अप्रैल 2020
कोरोना एक बड़ा संकट या समन्वय
कोरोना एक बड़ा संकट या समन्वय
चिड़ियों की चहचहाहट,आम एवं महुंवे के बौर की भीनी खुशबू से सराबोर घर-आँगन, कोयल की कूँ- कूँ, भौरे की गुन- गुन, कौवे की कॉव- कॉव,नदियों और झरनों की कलरव, मधुर एवं स्वच्छ सलिल से लतपथ सरोवर,कहसुनी हवा के झोंके वगैरह-वगैरह का एहसास न जाने कब तिरोहित हो गए।
आधुनिकीकरण के इस युग मे प्रकृति का दोहन हमने इस हद तक कर लिए कि अब प्रकृति को हमारे बीच कोरोना वायरस के रूप में पदार्पण करना पड़ा। प्रकृति और आधुनिकीकरण के बीच समन्वय स्थापित करने की यह एक सफल संकल्पना है।
आइये! अब हम सभी एक साथ मिलकर इस कोरोना वायरस को सकारात्मक रूप मे स्वीकार करें।घर में रहे,स्वच्छता एवं स्वस्थता का पालन करें। हमारा यह निर्णय ही हमारे प्रकृति एवं धरोहर की रक्षा करेंगे और पुनः पृथ्वी व घर आँगन आम व महुंवे की खुशबू से सराबोर हो उठेंगे।
- अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
"The attached image is a visual representation of corona as a saviour of mother nature. The corona infected person here has been visually represented as Lord Shiva with a third eye. Lord Shiva bound by his duty to be the destructor of mankind here protects mother nature by being an antidote to her biggest infection, i.e humans. Courtesy- thevibe.asia(via google images)"
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