अँधियारों के भटकाव तले
तू तेज़ रौशनी लौ की है।
तेरे सन्मार्ग पर चलकर हम
गिरते उठते फनकार भरे।
तू सृष्टा बन मेरे भीतर
अंकुर ज्ञान का भरता है।
इस अंकुर के प्रस्फुटन में
नव शोध वृक्ष पनपता है।
जब सघन वृक्ष की घनी छाँव
छतरी ताने फहराऊँगी ।
तब शायद तेरे ऋण से मैं,
गुरुवर मुक्त हो पाऊँगी।।
अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
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