सोमवार, 16 नवंबर 2020
मंगलवार, 3 नवंबर 2020
केतली चाय की
केतली चाय की
दर्द के दरवाजे पर दस्तक देती ,
लो आ गयी हॉट -चाय की प्याली।
धूंवें बिखेरती ,गिरती -फिसलती कप में ,
घूँट भर -भर कर हलक़ तक पहुंचती मेरे।
तेरी हॉट स्पर्श गले का आलिंगन करती ,
छुई -मुई कर देती है दर्द सारे।
तू चाय है।
एक छोटा -सा शब्द है जरूर।
पर ! बहू -सी निभाती है रिश्ते सारी।
दोस्तों के बीच तल्ख़ियाँ मिटाती तेरी प्याली,
जब यारों संग बैठ पी-लें -प्याली।
तेरे प्याली में डूबते सारे रिश्ते ,
न तुम हो तो सूख जाते सारे रिश्ते।
तेरा साथ शकुन देता है,
मन की मलीनता धो -देता है।
एहसास फुरसत का कराती तेरी प्याली ,
जब -काम के बीच -झूमती -आ जाती -प्याली।
इंतज़ार कराती है दफ़्तर से उनके आने की ,
पति-संग- साथ बैठ प्याली- निभाने की।
तेरे खुशबू में सम्मोहन यूँ होता है ,
खींच सबको यूँ अपनों से बाँध देता है।
हर्षोल्लास -संग मेहमान -नवाज़ी निभाती तू है ,
कोरोना साथ तुलसी संग -भगाती तू है।
तेरी तारीफ़ में शब्द छोटे पड़ते हैं ,
छोटी -इलायची भी तो साथ तेरे संजते हैं।
तेरी सुगंध बदल देती है माहौल को ,
सुस्ती दूर कर चुश्ती बढ़ा देती है।
यूँ- अदरक का साज़ भी जो तेरे हाथों में ,
मानो-मोहिनी -मुरली हो तेरे हाथों में।
अश्वगंधा व् लौंग का कर लेती है जब श्रृंगार तूँ,
दोस्त ! इम्यून सिस्टम को कर देती है बलवान तूँ।
तू आजा !
भर -लूँ मैं अपनी प्याली में।
नशा शराब में नहीं है ,
है तेरी प्याली में।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. For details about the painting, check this link.
शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020
श्रम का मूल्य
श्रम का मूल्य
मखमली -घास पर चलना- चलते रहना,
पसंद है मुझको।
पर ! धरती -फाड़ श्रम-सिंचित बूंदे तेरी ,
द्रवित करती हैं मुझको।
सुंदर रेशम- से लिपटी तराशती-काया ,
मोह से मोहित करती है मुझको।
पर ! धागों की- चुभन से छिलती उँगलियों के ज़ख्म तेरे ,
मेरी आँखों में अश्क़ बन छलकतीं है जमीन पर।
ये तश्तरी -भर- खाने की लज़ीज़ स्वाद से लतपथ ,
चाटती हूँ मैं सराबोर हो उँगलियाँ अपनी।
पर ! रसोई में दिन -रात का समर्पण व निष्ठा तेरी ,
रौंद देते हैं मेरे सारे जज़्बात को।
मेरे मित्र ! तेरा श्रम व निःस्वार्थ संवेदना तेरी ,
झकझोरतीं हैं मेरे भोग -निष्ठ स्वार्थ को।
जिधर भी देखूं !,उधर ही तश्वीरें श्रमिक के शोषण की।
श्रमिक को रोटी नसीब नहीं ,भोगी को भोग का मूल्य नहीं।
भोगी तू कर ले श्रम थोड़ा आगे बढ़कर ,
जी ले जीवन "इनका" तू भी एक पल।
हाँ ! जी ले हम भी जीवन "इनका" एक पल।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
शनिवार, 17 अक्टूबर 2020
जो तुम आ -जाते एक बार (part-2)
जो तुम आ -जाते एक बार (part-2)
जो तुम आ -जाते एक बार
धुल जाते सारे राग-ताप।
जो तुम आ -जाते एक बार।
ऐसी चुप्पी क्यों साथ -साथ ,
जिसमें सन्नाटों की बास।
जो देते जख्मों पर आघात ,
जो तुम आ -जाते एक बार।
सुन लेती तुम जो मेरी बात ,
सन्नाटों में होते धुन हजार।
नजरें कर देती शिक़वे बयान।
रिमझिम झींसे- स्नेहिल तार,
भेदे मिटते सारे संताप।
छंट जाते बादल पृथक तार।
हो जाते मन भी खुशगवार।
जो तुम आ -जाते एक बार।
बोझिल मन भी हो शांत -शांत ,
बाहर मौसम भी खुश मिज़ाज।
सोने का सूरज साथ -साथ,
रोशन करता ये गुलिस्तां।
जो तुम आ -जाते एक बार।
संपने बुनती मैं बार -बार ,
कर आँखों से बातें हजार।
जो तुम आ जाते एक बार।
धड़कन भी करती सौ बात ,
हर आहट नजरें झाँक-झाँक।
जो तुम आ -जाते एक बार।
मधुरम बेला करते तलाश ,
संग ख्वाबों में भी बांध शमाँ ।
जो तुम आ -जाते एक बार।
खुद से करती बातें हज़ार।
पल -पल करती मैं इंतजार ,
जो तुम आ -जाते एक बार।
संवेगों की ये तीक्ष्ण चाप ,
कर देती मुझको हैरान।
जो तुम आ -जाते एक बार।
यांदो की विस्मृत ये उड़ान ,
गूँथी मंजरियों संग याद,
जो तुम आ -जाते एक बार।
भावों के मंजर साथ -साथ,
पलते रिश्ते की हर शाख।
जो तुम आ -जाते एक बार।
बदले -बदले से हर तार ,
मुद्रा भी करती नृत्य -नाद।
जो तुम आ -जाते एक बार।
भावों के भाव -थपेड़ों में ,
पल -पल गुजरे जो साथ -साथ।
जो तुम आ -जाते एक बार।
जीवन शिक़वे के भी हज़ार ,
कर लेते मिल दो -चार -हाथ।
जो तुम आ -जाते एक बार।
जीवन के इतने रंग -तले ,
हम भी बन जाते चित्रकार।
जो तुम आ -जाते एक बार।
हर रंगों की अपनी है छाप,
ले -लेते ठप्पे साथ -साथ।
जो तुम आ -जाते एक बार।
मधुरम काया ले साथ -साथ,
घुल -मिलकर रहते साथ -साथ।
जो तुम आ -जाते एक बार।
जीवन के इन चलचित्र तले,
दुःख में भी रहते साथ -साथ।
जो तुम आ -जाते एक बार।
सूई-धागे बन साथ -साथ,
गूँथते रिश्ते के हर तार,
जो तुम आ जाते एक बार।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. Image from efficacy.org
गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020
जो तुम आ जाते एक बार (part-1)
जो तुम आ जाते एक बार (part-1)
जो तुम आ जाते एक बार ,
बातें कर लेती मैं हजार।
जो तुम आ जाती एक बार।
गीले -शिक़वे सब भूल -भाल ,
हो जाते हम -तुम साथ -साथ ,
जो तुम आ -जाते एक बार।
मुग्धा करते ये तेरे भाल ,
अविरल अश्रु से भीग -भाग।
जो तुम आ -जाती एक बार।
तेरे अंतस्थल छेंद बाण,
कर देती शिक़वे चूर -चूर ,
उमड़े नयनों में प्रलय-प्रवाह।
जो तुम आ जाते एक बार।
अंतस्तल के संवेग -तले ,
फिसलते शिक़वे साथ -साथ ,
कुछ तुम कहते -कुछ हम कहते ,
मिटते सन्नाटों के तार,
जो तुम आ -जाते एक बार।
पल -पल तांडव के सुर -ताल ,
मन में करते अंतर्नाद।
जो तुम आ -जाती एक बार।
हो जाते हम भी एक साथ ,
जो तुम आ -जाते एक बार।
उमड़ते सारे भाव -प्रलाप ,
भीगे नयनों से कर के वार,
हिंचकोले खाते अश्रु -तार ,
नथुनों संग करते आघात ,
जो तुम आ -जाते एक बार।
करते गातों से युद्ध -वार ,
ज्वाला बन भी करते आघात।
जो तुम-आ -जाते एक बार।
ह्र्दय-भेदे जब अश्रु -तार ,
मिट जाते सारे हृदय-ताप।
जो तुम आ -जाते एक बार।
सुन लेते मेरी तुम जो बात ,
हर लेते मेरे हृदय -ताप।
खोल जो देते हृदय -द्वार ,
हो जाते हम भी पास -पास।
जो तुम आ जाते एक बार।
- अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the images. The illustration was taken from pngio.com
**the poem was inspired by one of the greatest works of Mahadevi Verma, "Jo Tum Aa Jaate Ek Baa"
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2020
निद्रा
निद्रा
बंद आँखों में संजती सदा,
खुली आँखों में वास तेरा।
पलकें खोलूं तो सबेरा ,
बंद आँखे गहन अँधेरा।
ये अँधेरी रात तलाशती तुझको ,
तेरे आने की दस्तक बताती मुझको।
घुमड़ -सिहरन की चोट सी ,
उमड़ती आँखों में विश्राम तू।
तेरे आने से श्रांत होती धड़कन ,
नस -नस बिखेरती सिहरन।
तेरे छूने से मन विश्राम करता मेरा ,
दिलो -धड़कन भी आराम करता मेरा।
तेरे होने से चार्ज होता हर पल ,
तेरा आना विश्राम देता तत्क्षण।
हलचल तेरा तरोताजा करता मुझको ,
नई सुबह ला जगाता मुझको।
स्फूर्ति सुनहरी रश्मियों को बिखेरकर,
नव जोश भर राह पर चलाता मुझको।
पथ चुन आगे बढ़ाता मुझको,
कशिश को कोशिश भी बनाती तू ही।
मुस्कान भर मंजिल तक पहुँचाती तू है।
तेरा होना यूँ जरूरी सा लगता मुझको ,
जिंदगी में श्वासों का होना जैसे।।
- अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustration. The image was added from society6
शनिवार, 10 अक्टूबर 2020
मित्रता
मित्रता
मित्रता एक भाव है,
संबंधो का शिलान्यास है।
उम्मीदों की आस है,
भीनी -एहसास है।
रिमझिम -बरसात है ,
तपन की प्यास है।
उम्मीदों की आस है,
बेफिक्र भी ख्वाब है।
रिश्ते की जान है ,
उमंगो की उड़ान है।
अनजाना पहचान है,
रिश्ते की शाख है।
पत्तों की झिलमिल छांव है।
गुत्थी सुलझाने की ,
मुश्किलें भगाने की,
जख्मो को भरने की,
सोच को बदलने की,
पथ को परखने की ,
संकल्प को लेने की ,
लक्ष्य को छूने की।
सपने जगाने की ,
राह की तपिश में ,
चंदन विखेरने की।
सपने बुनने की ,
मंजिल को लेने की।
बस !
जरूरत है तुमको,
मित्र को परखने की।।
अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations
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