शुक्रवार, 8 जनवरी 2021
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कागज़ की नौका से,
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गुरुवार, 7 जनवरी 2021
एक दीप जलाएं हम।
एक दीप जलाएं हम।
इन अँधेरी रातों में,
चल एक दीप जलाएं हम।
तेरे दीए मेरे दीए,
झिलमिल -झिलमिल की लौ करके।
रातों की अँधेरी तलछट को,
अपनी लौ से रोशन कर दें।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. The image was taken from fineartamerica.com
रविवार, 27 दिसंबर 2020
प्रिय
प्रिय
जीवन -राह में साये -सी,
पल -पल मैं यूँ बन जाऊँगी।
हर- दिन की प्रातः लाली -सी ,
चेहरे पर मैं छा जाऊँगी।
चिड़ियों की चहचहाहट में,
आहट मेरी ही पाओगे।
खिड़की से ये अंडे -चूजे,
यूँ याद मेरी ही सतायेंगे।
जितना ही दूर करोगे मुझको,
पास मैं उतना आऊँगी।
हर -धड़कन में साँसें बनकर,
जीवन -ज्योति बन जाऊँगी।
सबसे नहीं सिद्धांत यह - मेरा
पर तुझसे ऐसा क्यों है ?
जब भी यह पूछोगे खुद से,
तुम प्रियतम भाव ही पाओगे।
हाँ। प्रियतम- भाव ही पाओगे।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
मंगलवार, 22 दिसंबर 2020
ख्वाहिश ही जीवन
ख्वाहिश ही जीवन
मन की किताब खोलूँ ,
तो ख्वाहिशों के पन्ने।
पन्नो पर अंकित शब्द ,
यूँ झूमते गज़ल हों।
मांझी भी तो तूं है,
पतवार भी तो तूं है।
जीवन तू है धारा,
पानी सा बहता पल है।
जीवन हमें बढ़ाती,
, यूँ तेज़ धार करके।
बढ़ता रहे तूं यूँ ही ,
ले ख्वाहिशों की डोरी ,
जीवन को इनसे- कस कर,
ले बढ़ ले- तूं बढ़ कर।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. The art belongs to Sara Riches
मंगलवार, 15 दिसंबर 2020
बेटी
बेटी
बेटी पापा की ताज़ है तू ,
घर -आंगन की पहचान है तू।
तेरे किलकारी से गूंजे ,
महके घर -आंगन में खुशबू।
संगी- मां की हमदर्द- पिता ,-
सशक्त कदम से बढ़ती तूँ।
तेरी -धड़कन तेरी शाया ,
पल -पल देती एक छांव है तूँ ।
मेरे धड़कन की राग है तू ,
स्वर -ब्यंजन की भी छाप है तू।
स्नेहिल मधुरं कुदरत कृति ,
इनकी अनुपम सौगात है तू।
बेटी कुदरत के रचना की ,
अनुपम अप्रतिम उपहार है तू।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. The image was taken from pinterest
शनिवार, 5 दिसंबर 2020
अंतस्तल
अंतस्तल
सोचती हूँ मैं शांत व निश्चल,
क्यों हो जाता है अंतस्तल।
रे निश्चल !क्या राज़ है तेरा।
क्या पाई ! क्या पाई तूने मादकता।
तेरी मोदकता ! का रहस्य छिपा नहीं ,
हर कण -कण में तू रहा सही।
पर तेरी पूजा करता संसार ,
है नश्वर मायावी अल्फ़ाज़।
करता बुराई प्रेम की ,
मरता इन्ही के रेत से।
ये नश्वर मायावी संसार ,
तेरी पूजा करता दिन -रात।
नहीं जानता यह नादान,
क्या है तेरे मन का राज़।
डूबा लेता तू अंतस्तल को ,
मिटा देता मेरे अंतर्तम को।
दिखा देता है नई ज्योति ,
मिटा देता है मन का क्लेश।
मन घुमड़कर -उमड़ -उमड़ कर,
भिगो जाती ओसीली बूँदे।
नम कर देती हैं ये बूँदे ,
अधखिले सुमन उरवर को।
सूरज की नई प्रभा ,
खिला जाती सुमन रमां।
मिटा जाती हैं सारे क्लेश ,
भर जाते उर मधुर मिलन से।
चांदनी के साथ फिर तो ,
चाँद गता नव मधुर।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations
गुरुवार, 26 नवंबर 2020
काले बादल गर्जन करते
काले बादल गर्जन करते
काले बादल गर्जन करते ,
माना की कोरोना क़ायम है ,
यूँ अर्थ- व्यवस्था घायल है।
रातें अँधेरी फैली हैं,
काले बादल भी घेरे हैं।
बिजली भी यूँ खिखियाती हैं ,
बच्चे-बूढ़े भी आहत हैं।
ये रात अँधेरी मिट जाएगी ,
सूरज फिर से चमकेगा।
बादल तेरी इस गर्जन को ,
तरकश ले सूरज निकल चला।
काले बादल अब छिप ले तू ,
तेरी गर्जन को चुप करने ,
लो बढ़ ले आभा प्रकट हुई।
तेरे किस हिस्से में बिजली ,
कोइ मुझको बतला तो दे ,
ले बटन दबा यूँ मुक्त करूं ,
जिससे बच्चे डर जाते हैं,
उन घिरते काले बादल से ,
पानी की थैली मैं ले लूँ ,
ले कृषक की तकती आँखों को ,
पानी की थैली मैं दे दूँ।
इन प्यासी धरती कण -कण को ,
झम -झम बारिश से मैं भर दूँ।।
हाँ! उर्वरता से इनको भर दूँ।।
अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations.
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