रविवार, 27 दिसंबर 2020
प्रिय
जीवन -राह में साये -सी,
हर- दिन की प्रातः लाली -सी ,
चिड़ियों की चहचहाहट में,
सबसे नहीं सिद्धांत यह - मेरा
तुम प्रियतम भाव ही पाओगे।
मंगलवार, 22 दिसंबर 2020
ख्वाहिश ही जीवन
ख्वाहिश ही जीवन
मन की किताब खोलूँ ,
तो ख्वाहिशों के पन्ने।
पन्नो पर अंकित शब्द ,
यूँ झूमते गज़ल हों।
मांझी भी तो तूं है,
पतवार भी तो तूं है।
जीवन तू है धारा,
पानी सा बहता पल है।
जीवन हमें बढ़ाती,
, यूँ तेज़ धार करके।
बढ़ता रहे तूं यूँ ही ,
ले ख्वाहिशों की डोरी ,
जीवन को इनसे- कस कर,
ले बढ़ ले- तूं बढ़ कर।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. The art belongs to Sara Riches
मंगलवार, 15 दिसंबर 2020
बेटी
बेटी
बेटी पापा की ताज़ है तू ,
घर -आंगन की पहचान है तू।
तेरे किलकारी से गूंजे ,
महके घर -आंगन में खुशबू।
संगी- मां की हमदर्द- पिता ,-
सशक्त कदम से बढ़ती तूँ।
तेरी -धड़कन तेरी शाया ,
पल -पल देती एक छांव है तूँ ।
मेरे धड़कन की राग है तू ,
स्वर -ब्यंजन की भी छाप है तू।
स्नेहिल मधुरं कुदरत कृति ,
इनकी अनुपम सौगात है तू।
बेटी कुदरत के रचना की ,
अनुपम अप्रतिम उपहार है तू।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations. The image was taken from pinterest
शनिवार, 5 दिसंबर 2020
अंतस्तल
अंतस्तल
सोचती हूँ मैं शांत व निश्चल,
क्यों हो जाता है अंतस्तल।
रे निश्चल !क्या राज़ है तेरा।
क्या पाई ! क्या पाई तूने मादकता।
तेरी मोदकता ! का रहस्य छिपा नहीं ,
हर कण -कण में तू रहा सही।
पर तेरी पूजा करता संसार ,
है नश्वर मायावी अल्फ़ाज़।
करता बुराई प्रेम की ,
मरता इन्ही के रेत से।
ये नश्वर मायावी संसार ,
तेरी पूजा करता दिन -रात।
नहीं जानता यह नादान,
क्या है तेरे मन का राज़।
डूबा लेता तू अंतस्तल को ,
मिटा देता मेरे अंतर्तम को।
दिखा देता है नई ज्योति ,
मिटा देता है मन का क्लेश।
मन घुमड़कर -उमड़ -उमड़ कर,
भिगो जाती ओसीली बूँदे।
नम कर देती हैं ये बूँदे ,
अधखिले सुमन उरवर को।
सूरज की नई प्रभा ,
खिला जाती सुमन रमां।
मिटा जाती हैं सारे क्लेश ,
भर जाते उर मधुर मिलन से।
चांदनी के साथ फिर तो ,
चाँद गता नव मधुर।।
-अनुपमा उपाध्याय त्रिपाठी
*we do not own the illustrations
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